आर्य कौन ?

*आर्य कौन है ?*
— आज यह प्रश्न एक महाशय ने पूछा |

*आर्य* का अर्थ है वह व्यक्ति जो त्रिविध ( आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) प्रगति में सक्षम हो, अर्थात चारों पुरुषार्थों की सिद्धि द्वारा अपने भीतर स्थित पुरुष को उसके सच्चे अर्थ की ओर गति कराये  ।

*आर्य* का धातु है  *ऋ* जिसका अर्थ है सर्वांगीण और सच्ची  *प्रगति* |

यह तभी सम्भव है जब पशु की तरह स्वेच्छाचारिता की ओर प्रेरित करने वाली प्राकृतिक स्वभाव की जड़-प्रवृतियों के पाशविक पाश से व्यक्ति निकले, और प्रकृति से संस्कृति की ओर प्रगति के कारक धर्म के कर्मकाण्डों द्वारा सही तरीके से संस्कारित हो |

बुद्धि, अहंकार, मन और इन्द्रियाँ जड़ तत्व हैं जो स्वभाव के अनुसार वर्तती रहती हैं और तब तक नहीं बदलती जबतक बाह्य बल न लगे |

प्राकृतिक समाज में रहने वाले मनुष्य को ऐसी शिक्षा-दीक्षा नहीं मिल पाती जो मन-बुद्धि आदि को आत्मकल्याण के सही रास्ते पर प्रेरित कर सके |

व्यक्ति और समाज को सही दिशा में गति कराने के तत्व को धर्म कहते हैं और धर्म को धारण करने वाले समाज को आर्यसमाज कहते हैं (वह प्राचीन पौराणिकों का समाज था, आधुनिक मूर्खों का अनार्यसमाज नहीं)|

धर्म का अर्थ है वैदिक कर्मकाण्ड, और धर्म के लक्षण हैं धृति-क्षमा-दम-अस्तेय-शौच-इन्द्रियनिग्रह-धी-विद्या-सत्य-अक्रोध |

यदि कर्मकाण्ड में ये लक्षण न हो तो वे धर्म नहीं, धन्धा हैं, केवल दिखावा हैं |

संस्कार का अर्थ है सम्यक कर्म करने के प्रेरक तत्त्वों का समुच्चय जो कुछ तो पिछले जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप प्रारब्ध में रहता है, और शेष वर्तमान जीवन में अर्जित करना पड़ता है |

यज्ञ द्वारा मनुष्य वाञ्छित अपूर्व फल की प्राप्ति करता है, जो पूर्व में नहीं थे |

किन्तु किसी भी प्रकार के यज्ञ की योग्यता प्राप्त करने से पहले कुछ विशिष्ट यज्ञों के द्वारा जीवन को सही मार्ग के अनुरूप ढालना पड़ता है जो आज  *हिन्दू संस्कार* कहलाते हैं |

गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक के ये संस्कार कतिपय विशिष्ट यज्ञ हैं  जो  *कल्प*  नाम से प्रसिद्ध वेदाङ्ग के अन्तर्गत अपनी वैदिक शाखा के अनुसार निर्दिष्ट सूत्र-साहित्य में निर्दिष्ट कर्मकाण्ड हैं |

धर्मशास्त्र में निर्दिष्ट कर्मकाण्डीय संस्कारों को समझकर जीवन में उतारने पर जीवन के समस्त कर्मों को धार्मिक रीति से करने और धर्म के वास्तविक लक्षणों को जीवन में धारण करने का सामर्थ्य बढ़ता है | तभी मनुष्य वास्तव में आर्य बन पाता है |

अष्टावक्र ने कहा था कि मनुष्य का मूल्यांकन जो व्यक्ति ज्ञान और संस्कार के स्थान पर चमड़ी के आधार पर करे वह ब्राह्मण वंश में भी उत्पन्न हो तो वास्तव में चमार है |

यूरोप के आधुनिक चमारों ने आर्य की परिभाषा चमड़ी के रंग पर आधारित नस्लवाद द्वारा की, ताकि गोरे नस्ल को श्रेष्ठ सिद्ध किया जा सके, यद्यपि आधुनिक विज्ञान के अनुसार मेलानिन की कमी के कारण गोरा नस्ल सबसे घटिया नस्ल है जो नियमित रूप से पर्याप्त धूप न सेंके तो विटामिन-डी की कमी के कारण प्रतिरोधक (इम्यून) प्रणाली, हड्डी, प्रजनन क्षमता, हर प्रकार के कैंसर से लड़ने की क्षमता, आदि अनेक गुणों में कमजोरी का शिकार बनती है, और अधिक धूप सेंके तो चमड़ी पर धब्बे, चर्मकर्क (स्किन कैंसर), आदि अनेक रोगों से पीड़ित होती है |

जिस कुल में धर्म का पालन करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा वह तो चाहेगा ही कि अधार्मिक कुलों से सम्बन्ध न जोड़े | अतः कलियुग में आर्य का अर्थ कुलीन भी हो गया |

जातिप्रथा की उत्पत्ति और बहुत बाद में अछूत जाति के आविर्भाव के पीछे यही कारण है | किन्तु यह संसार के सभी समाजों में पाया जाता है — कोई भी समुदाय जिन गुणों को अच्छा समझती है उनसे भिन्न गुणों वाले समुदाय से सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहती |

भारत के वनों में दीर्घकाल तक राक्षसों का वर्चस्व रहा जिस कारण उत्तर भारत को ही आर्यावर्त कहने की परिपाटी चली, यद्यपि आर्यावर्त की अवधारणा से बहुत पहले सृष्टि के आरम्भिक काल में ही भरत (दुष्यंतपुत्र नहीं) के नामपर अजनाभवर्ष का नाम भारतवर्ष रखा जा चुका था जिसकी संस्कृति वैदिक अर्थात आर्य थी |

सनातन धर्म के स्तंभ हैं समस्त वानप्रस्थी और सन्यासी जिनका भारी बहुमत वनों में निवास करता था, उनकी देखभाल और सेवा करने वाले वनवासी अनार्य कैसे हो सकते हैं ?

श्रीराम ने वनों में छुपे राक्षसों का संहार किया, किन्तु उन्हीं वनों में बहुत से ऋषि-मुनि और उनकी सेवा करने वाले वनवासी भी तो रहते थे, श्रीराम को अयोध्या से सेना नहीं बुलानी पडी, सुग्रीव और हनुमान के समाज को अनार्य कैसे कह सकते हैं ?

अतः हर किसी को आर्य बनने का अधिकार है और यह सबका कर्तव्य भी है | किन्तु स्वयं अपने नाम में आर्य जोड़ना दम्भ का प्रदर्शन है जो मूर्खता का परिचायक है | कहना ही है तो अपने पिता को आर्य कहें, गुरु को आर्य कहें, स्वयं को आर्य बनाने का प्रयास करें | किसी परिवार के मुखिया को ही आर्य कहा जाता था क्योंकि वह कुल में श्रेष्ठ था, उसके पुत्र पृथ्वी के चक्रवर्ती भी हो जाएँ तो आर्यपुत्र ही कहलाते थे |

याद रहे, आर्य कोई नस्ल नहीं, सही कर्म करने के संस्कार का द्योतक है, जन्मजात प्रकृति का धर्म द्वारा परिष्कार का परिचायक है, प्राकृत से विमुख और संस्कृत की ओर गति का व्यवहार है | जीवन की केवल थ्योरी नहीं, प्रैक्टिकल है | आर्य का होमेलैण्ड स्लोवाकिया या उत्तरप्रदेश नहीं, द्युलोक है, जो आर्यों का स्रोत भी है और गन्तव्य भी |

बिना संस्कृत के आर्य बनना असम्भव है | आधुनिक युग में संस्कृत की अनेक बेटियां हैं, उनमें सबसे बड़ी है हिन्दी | अतः संस्कृत न भी आये तो इन भाषाओं के माध्यम से ऋषियों का ज्ञान आसानी से समझा जा सकता है | किन्तु अंग्रेजी या अरबी जैसी म्लेच्छ भाषाओं में ऋषियों की बातों का अनुवाद सर्वथा असम्भव है, अधिकाँश प्राचीन शब्दों का अनुवाद ही नहीं हो सकेगा | जैसे कि *आर्य* को ही लें — म्लेच्छों ने इसे चमड़ी का रंग बना दिया !!

*धर्म* को लें, बहुत ढूँढनेपर यूरोप की सभी भाषाओं में इसका एक ही सहोदर मिला — *DERM* (चमड़ा), जैसे कि Dermatology (चर्मरोगविज्ञान) – जो शरीर को धारण करें | असुरों में केवल देहवादी अर्थ बचा, *सनातन धर्म*  का अर्थ हो गया *चमड़ा* !! ऐसे चमारों से दूर रहें |

यूरोप में एक सिद्धान्त कल्पित किया गया है कि मानव समाज और भाषाएं पहले प्राकृत किस्म की थीं जिनका परिष्कार करके संस्कृत बनायी गयी | इस कल्पना के पीछे यह नास्तिक पूर्वाग्रह है कि ईश्वर तो है नहीं, अतः कीटाणुओं के विकास द्वारा मनुष्य अस्तित्व में आया | किन्तु मैक्समूलर ने पूरे जीवन में एक ही सत्य बात मुँह से निकाली थी जिसका उत्तर देने से चार्ल्स डार्विन आजीवन बचते रहे और उनके सारे चेले भी आजतक कतराते हैं — जैविक विकास से शरीर का विकास हुआ यह मान भी लें तो *चेतना* (मैक्समूलर ने *भाषा*  कहा था) कहाँ से टपक गयी मनुष्य में ?

मैक्समूलर कहना यह चाहते थे कि भाषाई चेतना बिना ईश्वरीय कृपा से सम्भव नहीं, और ईश्वर केवल यहूदी-ईसाई ही हो सकता है जिसने ईसापूर्व 4004 में संसार बनाया तथा आदम-हव्वा को धक्का देकर इजराइल भेज दिया !!

बिना भाषा के किसी मानव समाज में चेतना तो प्रकट नहीं हो सकती | वह ईश्वरीय भाषा संस्कृत नहीं थी इसे स्थापित करने में मैक्समूलर ने पूरा जीवन लगा दिया, किन्तु एक बात उनकी खोपड़ी में कभी नहीं आयी — कोई शतप्रतिशत पूर्ण चैतन्य समाज ही पूर्णतया वैज्ञानिक भाषा खोज सकता है, और ऐसा समाज केवल देवों का ही हो सकता है जिनकी भाषा – देवभाषा |

देवों के साक्ष्य कहाँ और कैसे मिलेंगे यह देवों के विधान के अनुसार जीने पर ही देखे जा सकते हैं, वरना ढूँढने पर भी प्राचीन आर्य सभ्याताओं के साक्ष्य नहीं मिलेंगे, केवल साहित्यिक अवशेष बचे हैं, उनमें भी मिलावट है | अन्य साक्ष्य मिलते भी हैं तो म्लेच्छों द्वारा दबा दिए जाते हैं |

(प्राचीन यूनान और मिस्र आदि देशों में वैदिक संस्कृति के अकाट्य साक्ष्य निकट भविष्य में पोस्ट करूँगा |)

~ *विनय झा*