सनातन विज्ञानम/समय मापक यंत्र कैसे-कैसे

समय मापक यंत्र कैसे-कैसे

आज तो समय के लिए हम हथघड़ी देख लेते हैं और आसानी से कह देते हैं कि छह बजे हैं, मगर ये बजते कैसे है ? कुछ समय पहले शंकु और धूपघड़ी होती थी। उससे पूर्व जलघड़ी का आश्रय लिया जाता था और जब-जब जल वाली घटी पानी में डूब जाती, पास खड़ा घण्‍टावादक घंटा बजाता था। यही ‘बजना’ था। सुनकर लोग कह देते थे कि 6:00 बजे हैं।

उससे पहले… वराहमिहिर ने जो संकेत दिया, वह इन दिनों हमें शिवालयों में देखने को मिल रहा है। शिवलिंग पर एक कुंभ टंगा हुआ दिखता है, यह समय-मापक जलयन्‍त्र का पूर्व रूप है और इसका मूलरूप भी यही था। हमने शिवलिंग को शीतल रखने के लिए उसको प्रयोग में लाकर उस परंपरा को निरंतरता दे रखी है। वराहमिहिर ने स्‍वयं यही कहा है कि अहोरात्र के लिए जलभरे हुए घड़े के मूल में बने छिद्र से जब एक साठवां भाग जल निकल जाए तो वह एक नाड़ी (24 मिनट) का समय होता है- द्यु निशि विनि:सृत तोया दिष्टिच्छिद्रेण षष्टि भागो य:। स नाडी…। (पंच सिद्धान्तिका 14, 31) अथर्ववेद में नाड़ी शब्‍द आया है और पारिभाषिक रूप में है।

वेदांग ज्‍योतिष में यही कहा गया है कि समय को जल बहाकर जानना चाहिए, लेकिन तरकीब नहीं बताई गई है। चाणक्‍य ने अर्थशास्‍त्र में जलयन्‍त्र द्वारा समय मापन की प्रक्रिया का उल्‍लेख राजा के उठने-बैठने, जागने-सोने के संदर्भ में कहा है, मगर वराहमिहिर की तरह चिन्‍ह लगे घट के समान घट या घटी का जिक्र नहीं है। सूर्यसिद्धांत में कदाचित पहली बार काल के माप के लिए कपाल यन्‍त्र का वर्णन आया है। कपाल या कपालक यन्‍त्र के लिए कहा गया है कि उसके लिए साफ पानी से भरे नाद में मूल में छिद्र वाले एक रिक्‍त कपालाकार ताम्रपात्र रख दिया जाता, जब यह जल में डूब जाए तो एक ‘नाडी काल’ होता है, आज सूर्य सिद्धांत की एकदम नई भूमिका लिखते समय यह श्‍लोक ध्‍यान में आया –

ताम्रपात्रमध छिद्रं न्‍यस्‍तं कुण्‍डेsमलाम्‍भसि।
षष्टिर्मज्‍जत्‍यहोरात्रे स्‍फुटं यन्‍त्रं कपालकम्। (सूर्य सिद्धांत 13, 23)

आर्यभट ने भी यही विधि प्रयोग में ली। वराहमिहिर ने समय मापन के लिए घट का उपयोग किया तो नाड़ी और घटी समान अर्थ वाले होकर प्रचलन में आए।
✍🏻श्रीकृष्ण जुगनू

वितस्ति , अरत्नि , हस्त , पद । चार मापों का प्रदर्शक एक उत्कीर्णन प्राप्त हुआ पार्थिनॉन में। वर्ष 2010 नेशनल जिओग्राफिक पर किसी कार्यक्रम में इसके विषय में दिखाया गया था, उसी समय कुछ बातें नोट की थीं।
कार्यक्रम का नाम याद नहीं रहा मन में दोबारा देखे जाने की इच्छा को पूरा किया उन अज्ञात लोगों ने जिन्होंने वीडिओ अपलोड कर रखे हैं।
खोज में समय लगता ही है।
2500 वर्ष पुराने मन्दिरों के बनाने वाले चार प्रकार के लोग थे जो अपनी अपनी मापों का व्यवहार करते थे। पार्थिनॉन की इस रचना में स्तम्भों आदि की ऊँचाई में चारों मापों का समन्वय किया गया, किसी भी प्रकार से मापने पर पूरी पूरी सँख्या प्राप्त हो जाये। और इस प्रकार जो प्राप्त हुआ उससे प्रसिद्ध गोल्डन रेशिओ का जन्म हुआ।
जिओमेट्री के लिये भारतीय शब्द शुल्ब है, आप कहेंगे शुल्ब का अर्थ डोरी होता है तो शुल्ब सूत्रों में डोरी के लिये रज्जु शब्द का व्यवहार किया गया है। ‘ज्यामिति’ कहने पर क्या यह अर्थ ध्वनित नहीं होता कि केवल ‘ज्या’ का ही मापन होगा? ‘शुल्ब’ अन्तर्गत रेखागणित, त्रिकोणमिति, ज्यामिति , क्षेत्रमिति सभी आ जाते हैं।
चार ओर समुद्र से घिरी भूमि में शिल्पियों ने अद्भुत कौशल दिखलाया, वहाँ सबसे पुराना सूर्य मन्दिर ही बना फिर अन्य देवियों के मन्दिर बनाये गये।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी

प्राचीन भारत के कुछ आश्चर्यजनक ज्योतिषीय माप-
(१) शनि का मन्दोच्च (सबसे दूर विन्दु) १ कल्प (४३२ करोड़ वर्ष) में ३९ परिक्रमा करता है (सूर्य सिद्धान्त, १/४२) तथा उसका पात (शनि कक्षा का पृथ्वी कक्षा से मिलन विन्दु) ६६२ परिक्रमा करता है (सूर्य सिद्धान्त, १/४४)। इतनी सूक्ष्म माप या गणना आज भी सम्भव नहीं है। अन्य ग्रहों के भी इसी प्रकार माप दिये हैं।

(२) सौर मण्डल का आकार सूर्य व्यास का १५७ लाख गुणा है (विष्णु पुराण, २/८/३)। यहां लिखने की पद्धति के अनुसार यह १५६.५ से १५७.५ के बीच या ०.३% की अशुद्धि है। यही माप ऋग्वेद (१०/१८९/३) में अन्य प्रकार से है-पृथ्वी व्यास का २ घात ३० गुणा। घात संख्या के अनुसार यह २९.५ से ३०.५ तक हो सकता है, अर्थात् ४०% की अशुद्धि है। यहां परिभाषा भी है कि जहां तक सूर्य का प्रकाश (ब्रह्माण्ड से) अधिक है (वि-राजते), उसे सूर्य का वाक् या सौर मण्डल कहा जायेगा। एक अन्य परिभाषा भी विष्णु पुराण (२/७/६) में दी है कि सूर्य के आकर्षण में जहां तक पिण्ड घूम सकता है वह सौर मण्डल की पृथ्वी है (जहां तक अधिक प्रकाश है, वह द्यु है)। यह सूर्य दूरी का का १ लाख गुणा है। वैदिक माप के अनुसार यह पृथ्वी व्यास का २ घात २४ गुणा (गायत्री छन्द के २४ अक्षर) है। आधुनिक अनुमान के अनुसार सूर्य से सबसे दूर कक्षा के धूमकेतु की दूरी ७०,००० से १५०,००० AU (Astronomical Unit-पृथ्वी से सूर्य की मध्य दूरी, अधिकतम तथा न्यूनतम का मध्य) है। इसमें ६०% की भूल है।

(३) विष्णु पुराण (२/७/३) के अनुसार ३ प्रकार की पृथ्वी (सीमाबद्ध पिण्ड) हैं जो सूर्य-चन्द्र द्वारा प्रकाशित हैं। प्रथम पृथ्वी ग्रह दोनों के द्वारा प्रकाशित है। दूसरी पृथ्वी सौर मण्डल है। इसमें भी पृथ्वी के चारों तरफ ग्रहों की गति से बने क्षेत्रों को द्वीप कहा गया है और इनके वही नाम हैं जो पृथ्वी के द्वीपों के हैं। ये द्वीप पृथ्वी के द्वीपों से बहुत बड़े हैं, और यह पृथ्वी चक्राकार है, गोल नहीं। बाद के संस्करणों में यह भेद नहीं समझ पाये। १००० योजन व्यास की पृथ्वी पर १६ करोड़ योजन चौड़े वलय का पुष्कर द्वीप सम्भव नहीं है, न १ लाख योजन का मेरु पर्वत। इन द्वीपों के बीच के भागों को सागर कहा है जिनके नाम पृथ्वी के सागरों जैसे ही हैं। आज भी आकाश के क्षेत्रों के वही नाम दिये जाते हैं जो पृथ्वी के स्थानों के हैं या कुछ व्यक्तियों के नामों पर हैं। सूर्य प्रकाश की अन्तिम सीमा ब्रह्माण्ड है (सूर्य सिद्धान्त, १२/९०) जिसे ऋग्वेद (१/२२/२०) में सूर्य का परम पद कहा है। यहीं तक सूर्य विन्दु रूप में दीख सकता है। इसमें भी केन्द्रीय घूमते चक्र को आकाश गङ्गा कहा गया है जिसका पृथ्वी की गङ्गा नदियों से कोई सम्बन्ध नहीं है। पुराणों में ७ मुख्य गङ्गा कही हैं-भागीरथी (भारत की), मागंगा (मेकांग), महागंगा (ह्वांगहो-चीन), येनेसी, लीना (बर्फ में लीन हो जाती है), वक्षु आदि।

अगले श्लोक (विष्णु पुराण, २/७/४) के अनुसार मनुष्य से जितनी बड़ी पृथ्वी है, हर पृथ्वी से उतना ही बड़ा उसका आकाश है। अर्थात् मनुष्य से आरम्भ कर पृथ्वी ग्रह, सौर पृथ्वी, ब्रह्माण्ड, पूर्ण विश्व (अनन्त है किन्तु इसी क्रम में मानते हैं) क्रमशः १-१ कोटि गुणा बड़े हैं। १०० लाख को इसी लिये कोटि कहते हैं। कोटि का अर्थ सीमा है जैसे भारत भूभाग की दक्षिण सीमा धनुष्कोटि है। मनुष्य के लिये विश्व की कोटि पृथ्वि है जो उससे १०० लाख गुणा बड़ी है, अतः १०० लाख = १ कोटि। इसी प्रकार पृथ्वी की कोटि सौर मण्डल १०० लाख गुणा बड़ा है, उससे बाहर अन्य ताराओं के क्षेत्र में क्या हो रहा है उससे कोई मतलब नहीं है। सौर पृथ्वी के लिये ब्रह्माण्ड ही विश्व की सीमा है, अन्य ब्रह्माण्डों से कोई मतलब नहीं है-यह भी १०० लाख गुणा बड़ा है।

इसको कई अन्य प्रकार से भी कहा गया है। हर पृथ्वी से उसका आकाश १ कोटि गुणा बड़ा है। बीच के ७ गोलाकार क्षेत्रों को १-१ वायु का क्षेत्र कहा है जो क्रमशः १०-१० गुणा बड़े है। या वेदों में कहा है कि लोकों की माप गायत्री छन्द से होती है। गायत्री छन्द में २४ अक्षर हैं तथा २ का २४ (२३.५) घात १ करोड़ होता है। मनुष्य से गायत्री गुणा (२ घात २४ गुणा) पृथ्वी है। पृथ्वी से गायत्री गुणा सौर मण्डल अगला रूप सावित्री है। पुनः गायत्री गुणा ब्रह्माण्ड सरस्वती है। ब्रह्माण्ड में जितने तारा हैं उतने ही मनुष्य मस्तिष्क में कण हैं। ब्रह्माण्ड से पुनः गायत्री गुणा नियति (मूल प्रकृति-पूर्ण विश्व) है। गायत्री वा इयं पृथिवी (शतपथ ब्राह्मण, ४/३/४/९), गायत्र्या वै देवा इमान् लोकान् व्याप्नुवन् (ताण्ड्य महा ब्राह्मण, १६/१४/४), द्यौः सावित्री (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, १/३३), मनो वै सरस्वान् (शतपथ ब्राह्मण, ७/५/१/३१) स्वर्गो लोकः सरस्वान् (ताण्ड्य महाब्राह्मण, १६/५/१५), अमावास्या वै सरस्वती (गोपथ ब्राह्मण उत्तर १/१२-जब ब्रह्माण्ड के सभी तारा दीखते हैं)।

(४) ब्रह्माण्ड में जितने तारा हैं उतने मनुष्य के लोमगर्त्त (कलिल = cell) हैं। इनकी संख्या १०० अरब है। ब्रह्माण्ड या शरीर की चूर्ण रूप में यह कण स्ंख्या है, अतः इसे खर्व (चूर्ण या १०० अरब) कहते हैं। गणनात्मक या स्थूल रूप गणेश है अतः उनको भी खर्व कहा है-खर्व स्थूल तनुं गजेन्द्र वदनम्-यहां खर्व का अर्थ नाटा तथा १०० अरब दोनों होगा। लोम गर्त्त एक समय की भी माप है जो मुहूर्त्त को ७ बार १५ से भाग देने पर आता है, अर्थात् १ सेकण्ड का प्रायः ७५,००० भाग। १ वर्ष में जितने लोमगर्त्त हैं, मनुष्य शरीर में उतने ही लोमगर्त्त हैं, इसलिये इसका यह नाम है।(शतपथ ब्राह्मण १२/३/२/५)।जितने नक्षत्र हैं, उतने ही लोमगर्त्त हैं- यावन्त्येतानि नक्षत्राणि तावन्तो लोमगर्त्ताः। (शतपथ ब्राह्मण १०/४/४/२)। दृश्य आकाश में ब्रह्माण्डों की संख्या भी उतनी ही है।

(५) पिता पुत्र सम्बन्ध-पिता का सक्रिय जीवन गार्हस्थ्य समाप्त होने पर पुत्र का आरम्भ होता है। अतः सौर मण्डल में भी एक के प्रभावक्षेत्र की सीमा पर स्थित पिण्ड उसका पुत्र हुआ। पृथ्वी का प्रत्यक्ष सम्बन्ध सूर्य से है जो जगत् की आत्मा है। उस पर अन्य ग्रहों द्वारा संशोधन होता है (वाजसनेयि संहिता, १५/१५-१९, १७/५८, १८/४०, कूर्म पुराण, ४१/२-८, मत्स्य पुराण, १२८/२९-३३, ब्रह्माण्ड पुराण, १/२४/६५-७३ आदि)। इसकी सीमा शनि तक है जहां तक के क्षेत्र हो सहस्राक्ष (१००० सूर्य व्यास दूर) या सूर्य रथ का चक्र कहा है (विष्णु पुराण, २/८/४)। अतः सूर्य का पुत्र शनि हुआ। सूर्य से मंगल तक ही ठोस ग्रह हैं जिसकी कक्षा को दधि समुद्र कहा है। इसमें सबसे बड़ा ग्रह पृथ्वी है, अतः इसका पुत्र सीमावर्ती ग्रह मंगल हुआ। किसी समय पृथ्वी के २ उपग्रह थे, चन्द्र तथा बाहरी कक्षा में बुध। पृथ्वी आकर्षण की सीमा पर बुध था, अतः यह चन्द्र का पुत्र है। दूर हटते हटते यह पृथ्वी की गुरुत्व सीमा से दूर हट गया पर इसकी अक्ष गति आज भी वैसी हई है जैसे पृथ्वी के उपग्रह रूप में थी (Our Planet-The Earth by M Byalko-Mir Publishers, Moscow, 1987-page 74)।

(६) पृथ्वी कक्षा x कल्प वर्ष संख्या = ब्रह्माण्ड कक्षा (सूर्य सिद्धान्त , १२/८२)
पृथ्वी कक्षा/ पृथ्वी व्यास = दृश्य जगत् (तपः लोक)/ ब्रह्माण्ड कक्षा
लोकों के माप का क्रम तथा अनुपात अभी तक आधुनिक विज्ञान के २२ सृष्टि सिद्धान्तों में कहीं नहीं है।

(७) इसी प्रकार मनुष्य से छोटे विश्व क्रमशः १-१ लाख भाग छोटे हैं। पहला विश्व कलिल है जो हमारे देखने की सीमा है इसलिये लक्ष है। यह मनुष्य आकार का प्रायः १०० हजार भाग है, अतः १०० हजार = लक्ष। अन्य छोटे विश्व हैं-जीव (परमाणु), नाभि (कुण्डलिनी), जगत् कण (परमाणु कण), देव-दानव, पितर, ऋषि।

वालाग्र शत साहस्रं तस्य भागस्य भागिनः। तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरञ्जनम् ॥ (ध्यानविन्दु उपनिषद् , ४)
ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितॄभ्यो देव दानवाः। देवेभ्यश्च जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः॥ (मनुस्मृति, ३/२०१)
वालाग्र शत भागस्य शतधा कल्पितस्य च ॥

भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/९)
षट्चक्र निरूपण, ७-एतस्या मध्यदेशे विलसति परमाऽपूर्वा निर्वाण शक्तिः कोट्यादित्य प्रकाशां त्रिभुवन-जननी कोटिभागैकरूपा । केशाग्रातिगुह्या निरवधि विलसत .. ।९। अत्रास्ते शिशु-सूर्यकला चन्द्रस्य षोडशी शुद्धा नीरज
सूक्ष्म-तन्तु शतधा भागैक रूपा परा ।७।

असद्वा ऽइदमग्र ऽआसीत् । तदाहः – किं तदासीदिति । ऋषयो वाव तेऽग्रेऽसदासीत् । तदाहुः-के ते ऋषय इति। ते यत्पुराऽऽस्मात् सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसारिषन्-तस्मादृषयः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/१)
अरुण उपाध्याय

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