गाली नहीं गले लगाकर आगे बढ़ें

वरुण पाण्डेय : देश भर में वर्ष पर्यन्त ब्राह्मणों द्वारा प्रवर्तित 60 महत्वपूर्ण त्योहार मनाए जाते हैं… इन त्योहारों में लगभग 10 लाख करोड़ का व्यापार पूरे देश में होता है और वर्ष पर्यन्त इन त्योहारों की अर्थव्यवस्था से लगभग 10 करोड़ लोगों को रोज़गार मिलता है……. इसीतरह देश में छोटे बड़े मिलाकर कुल 5 लाख हिंदू मंदिर हैं जिनमें प्रत्येक मन्दिर से औसतन 1000 परिवारों का व्यवसाय चलता है और भरण पोषण होता है…! ….. इन त्योहारों और मंदिरों से जुड़े व्यवसायों से 90% लाभ कमज़ोर वर्गों के लोगों को ही मिलता है………. ब्राह्मण प्रणीत धर्म समाप्त हो जाय तो इन 25 करोड़ लोगों का भरण पोषण नेता और अधिकारी करेंगे क्या ??.. शौचालय बनाइए मगर “देवालय से पहले शौचालय” जैसी विकास विरोधी बातें दिमाग़ से निकाल दीजिए !! ……. इसलिए देश की अर्थव्यवस्था को समृद्ध बनाने वाले और समाज के कमज़ोर वर्गों को वर्ष पर्यन्त रोज़गार दिलाने वाले #ब्रह्मवाद को प्रणाम करना भी सीखिए !!
… एते ब्रह्मवादिन: वदंति !

आपने फेसबुक पर बहुत सुना होगा पंडे-पुरोहित समाज को लूट रहे हैं ,इनका बहिष्कार करो आदि आदि । आइये जानते हैं पंडे-पुरोहित सदियों से क्या करते आये हैं । किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होता है अर्थ और पुरोहित इसी अर्थ को मजबूती प्रदान करते आये हैं ,आप कह सकते हैं पुरोहित एक तरह मार्केटिंग का कार्य करते हैं । सत्यनारायण की कथा हो या नूतनगृहप्रतिष्ठा हो अथवा विवाहादि मांगलिक संस्कार पुरोहित आपके अर्थ को मजबूती प्रदान करने का कार्य करते हैं । भगवान् सत्यनारायण की कथाका उद्देश्य आत्मरंजन करना है ,इससे हम भगवान् की भक्ति तो करते ही हैं ,साथ ही अर्थ को मजबूती भी प्रदान करते हैं। एक पुरोहित से जब सत्यनारायण की कथा कराते हैं ,तब वे जो सामग्री की सूची देते हैं ,उस पर कभी ध्यान दिया आपने ? सबसे पहले नवीन मिट्टी के कलश लेकर आओ ,उसके ढँकने के लिये मिट्ठी का पात्र लेकर आओ । सत्यनारायण की कथा में ऐसे पांच कलशों की स्थापना होती है – “पञ्चभि: कलशैर्जुष्टं कदलीतोरणान्वितम् ।” (भविष्यपुराण ) जब ये नवीन कलश खरीदे जाएँगे तब किसका लाभ होगा ? कुम्भकार का । तो पुरोहित ने किसके अर्थ की मार्केटिंग की ? अब पुरोहितजी कह काष्ठ की चौकी लेकर आओ । किसका अर्थ लाभ होगा उससे ? काष्ठकरको । तो किसकी मार्केटिंग की पुरोहित ने ? पुरोहित कहते हैं चौकी पर बिछाने के लिये पीला वस्त्र मँगाते हैं । किसको वृत्ति का लाभ होगा ? जुलाहे या बुनकर का । अग्निहोत्र करने के लिये ब्राह्मणोंके लिये सबसे पवित्र अन्न क्या है ? दान में प्राप्त अन्न इतना पवित्र नहीं है ,शिलोच्छवृत्ति (फसल कट जाने पर खेत से अनाज चुनकर लाना ) का अन्न ही अति पवित्र है ,फिर भण्डारगृह (अनाज मंडी) आदि का अन्न अग्निहोत्रके लिये पवित्र कैसे हो सकता है ? इसीलिये भगवत् आराधनके लिये वस्त्र भी बुनकरके यहाँ से लाया हुआ पवित्र है ,न कि किसी बजाज के यहाँ लाया हुआ । पीले वस्त्र से पुरोहित ने किसकी वृत्ति की मार्केटिंग की ? पुरोहितजी भगवान् शालग्रामके अभिषेक के लिये पंचामृत के लिये दूध ,दही ,मधु आदि मँगाते हैं । दूध से किसकी वृत्ति को लाभ हुआ ? गोपालकों को । मधु आजकल की तरह चासनी वाला तो पूजा में प्रयोग होता नहीं है ,तो मधु निकालने वाले से मधु मंगाया जाता है ,तब किसको वृत्ति का लाभ हुआ ? पुरोहित ने किसकी वृत्तिकी मार्केटिंग की ? पुरोहितजी भगवान् सत्यनारायण के लिये कच्चा सूत और मोली मंगाते हैं । इससे किसकी वृत्ति को लाभ हुआ ?सूतकातने वाले का । पुष्प और मालाओं को मंगाकर किसके वृत्ति की व्यवस्था की पुरोहित ने ? माली की । धूप-दीप से अर्चन कर पुरोहित जी नैवेद्य मंगाते हैं । उससे किसको लाभ हुआ ? हलवाई को । सत्यनारायण भगवान् को ताम्बूल निवेदन कर किसकी वृत्ति की व्यवस्था की ? पान बेचने वाले की । ऋतुफल समर्पित कर किसकी वृत्ति की व्यवस्था की ? फलों वाले की । षोडशोपचार के बाद हवन करते हैं ,हवन के लिये समिधा (आम आदि की लकड़ी) मंगाते हैं ,किसको लाभ होता है उससे ? लक्कड़हारे को । सत्यनारायण की कथा में एक भील जातिके लक्कड़हारे का चरित्र सुनाया जाता है ,जो काशी में शतानन्द नामके ब्राह्मण जो कि सत्यनारायणकी कथा कर रहे होते हैं ,के घर अपनी लकड़ी बेचने जाता है – “वनात्काष्ठानि विक्रेतुं पुरीं काशीं ययु: क्वचित् ।एकस्तृषाकुलो यातो विष्णुदासाश्रमं तदा ।।”(भविष्यपुराण ) सारी लकड़ी बिक जाने पर वह भिल्ल लक्कड़हारा भी भगवान् सत्यनारायण की कथा करवाता है । तो हवन की लकड़ी से किसकी वृत्ति की मार्केटिंग हुई ?
अब बताइये सत्यनारायण भगवान् की छोटी सी पूजा से कितनों की वृत्ति की मार्केटिंग की पुरोहित ने ? क्या पुरोहित इन सबसे कमीशन लेते हैं ? ब्राह्मण पुरोहित बिना शुल्क बिना कमीशन के लिये सबकी वृत्ति की व्यवस्था करते हैं । यही नहीं जो ब्राह्मण पुरोहित धनके लालच में कर्मकाण्ड का आश्रय लेते हैं ,उनके अन्न को तो शास्त्र ने अपवित्र घोषित कर ही दिया है साथ में ऐसे पुरोहितों को श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन के भी अयोग्य ठहरा दिया है । चारों वर्णों की वृत्ति की व्यवस्था करने वाले ब्राह्मण पुरोहितका पालन यथासामर्थ्य दान-दक्षिणा देकर करना चाहिये । यज्ञ-पूजापाठके मण्डप स्थल पर गोबरसे लीपकर चौक बनाने और सर्वसमाज को यज्ञ-पूजापाठ में बुलावा देने की वृत्ति नापित पुरोहित कराते हैं । तुलादानके द्वारा चांडाल की वृत्ति पुरोहित कराता है । बच्चे के जन्मके समय मूल उतारने की वृत्ति ,तेल दान की वृत्ति भड्डरी को पुरोहित कराता है । यह सब सङ्केत मात्र हैं ,यह व्यवस्था बहुत विस्तृत है ,जिसका एक लेख में लिख पाना सम्भव ही नहीं । वर्णाश्रम व्यवस्था में कोई किसी की वृत्ति का हरण नहीं करता है ,अपितु सभी वर्ण एक दूसरे का भरण-पोषण करते हैं ,जिससे सभी की वृत्ति निर्धारित होती है ,समाज को वृत्ति लाभ होने पर राष्ट्रकी अर्थव्यवस्था सुदृढ होती है । अर्थव्यवस्था सुदृढ होने पर धर्म की रीढ़ सुदृढ होती है ।
जब किसी राष्ट्र को दासिता की जंजीरों में जकड़ना हो ,तो उसकी रीढ़ अर्थव्यवस्था को मिटा दे ,अर्थव्यवस्था मिटती है उस राष्ट्र की संस्कृति और परम्परा से जिससे समाज का भरण-पोषण सहस्राब्दियों से होता आया हो । अँग्रेजों ने भी यही किया ,भारत पर राज्य करने के लिये भारत की रीढ़ भारतकी अर्थव्यवस्था पर प्रहार किया ,अर्थव्यवस्था पर प्रहार करने के लिये संस्कृति को मिटाना आवश्यक था । भारतीय अर्थव्यवस्था और संस्कृति के मूल पुरोहितों को मिटाना आवश्यक था । तो अँग्रेजों ने पुरोहितों के प्रति समाज के मन में घृणा भर दी ,जिससे पुरोहित नष्ट हुए । फिर समाज के अन्य वर्गों की वृत्ति नष्ट की ,जो हस्तशिल्पी-कारीगर थे ,उनको नष्ट करके । हस्तशिल्पियों को उन्हें नष्ट किया आधुनिक मसीनों के द्वारा । पुरोहितों के नष्ट होने से अर्थ व्यवस्था पर सीधा प्रहार किया ,सबकी वृत्ति की मार्केटिंग बन्द हुई ,फिर सबकी वृत्ति के साधन भी छीन लिये गये । परिणाम स्वरूप भारतमें आर्थिक विपन्नताका संकट उत्पन्न हो गया । आज युवा बेरोजगार क्यों है ? क्योंकि जो वृत्ति सभी वर्गों को हमारी संस्कृति में नैसर्गिक प्राप्त थी ,वह विदेशी षड्यन्तकारियों ने नष्ट करके एक दूसरे वर्ग के प्रति ऐसी घृणा भरी की उसकी भरपाई आज तक नहीं हो पाई है । हस्तशिल्पी-कारीगरों को नष्ट कर बड़े-बड़े यन्त्रों वाले कारखानों को जन्म दिया गया ,जिससे अर्थव्यवस्था पूर्ण रूप से चरमरा गई ,अब भी उन्ही उद्योगों की मार्केटिक बड़े बड़े क्रिकेटरों-अभिनेताओं के द्वारा होती है ,जिसके लिये वे करोड़ो-अरबों कम्पनियों से बसूलते हैं । हस्तशिल्पियों – कारीगरों के द्वारा निर्मित उत्पादनों की यही मार्केटिंग ब्राह्मण पुरोहित बिना शुल्कके करते थे ,तब उन पुरोहितों को अत्याचारी ,लुटेरे पंडे-पुरोहित बनाकर समाजमें उनके प्रति घृणा भर दी गयी । उत्पादन आज भी है ,मार्केटिंग आज भी है ,लेकिन आज अर्थव्यवस्था भी कमजोर है और ज्यादातर समाज वृत्तिविहीन बेरोजगार हैं । सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है आज भी स्वयं को धार्मिक हिन्दू कहने वाले कोई सत्यनारायण की कथा को पाखण्ड के नामपर तो कोई शोषणके नाम पर अर्थ व्यवस्था आधार ,सबकी वृत्तिकी मार्केटिंग करने वाले ब्राह्मण पुरोहितों का दुष्प्रचार करने में लगे हुए हैं । भारतकी रीढ़ अर्थ व्यवस्था पर प्रहार करने वाले ,भारत को विपन्नता की युवाओं को वित्तिविहीनता की भीषण चपेट में लाने वालों में आपका भी योगदान होगा । मिटा दीजिए पंडे-पुरिहितों को ,शतप्रतिशत रोजगारी का प्रकल्प कहाँ से लाएँगे ? एक तरफ पुरोहित भगवान् की कथाके माध्यम से समाज के आत्मरंजन में लगे थे ,तो वहीं दूसरी तरफ वे सबकी वृत्ति की व्यवस्था करके अर्थ को मजबूत बना रहे थे । आज पुरोहितों को नष्ट करके आत्मरंजन को भूल मनोरंजन के नाम पर सिनेमा जगत् को करोड़ो-अरबों रुपये का व्यापार कराते हैं ,फिर बेरोजगारी नहीं मिटा सकते हैं ,लेकिन गाली पंडे-पुरोहितों को देंगे। आश्चर्य है ।

Leave a Reply