गुरुत्वाकर्षण का नियम और महर्षि भाष्कराचार्य:कृष्णप्रिया

गुरुत्वाकर्षण का नियम और महर्षि भाष्कराचार्य

हम सभी आज भी विदेशी को बहुत बड़ा ग्यानी -बिग्यानी समझते है ..जबकि हिन्दू सनातन धर्म में वेदों और अन्य ग्रंथो में बिज्ञान भरा पडा है पर हम लोग आज भी इन ग्रंथो को पढ़ना तो दूर अपने घर में भी नहीं रखते है ! क्या हमें अपनी शास्त्रो से प्रेम नहीं है ? अब आप इस गुरुत्वाकर्षण की खोज का श्रेय न्यूटन को देते है जबकि सच्चाई कुछ और ही है …गुलामे के दौर में हमारे बहुत से ग्रंथो से चुराया हुआ ज्ञान ही हमें परोशा जा रहा है यहाँ तक की नीम और हल्दी को भी पेटेंट में भी अमेरिकी गिध्द दृष्टि लगी है और हमारी सरकार मूक दर्शक बनी है !

गुरुत्वाकर्षण शक्ति कि खोंज न्यूटन ने की ,ये हमारे लिए शर्म की बात है.

👉गुरुत्वाकर्षण पहले वेदो में, उसके पश्चात महर्षि कणाद जी के वैशेषिक दर्शन शास्त्र में उल्लेख हो चुकी है।

परंतु आज गणित और ज्योतिष के महान विद्वान भास्कराचार्य जी के सिद्धांत पर चर्चा होगी।

जिस समय… न्यूटन के पुर्वज जंगली लोग थे ,उस समय मह्रिषी भाष्कराचार्य ने प्रथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पर एक पूरा ग्रन्थ रच डाला था. किन्तु आज हमें कितना बड़ा झूंठ पढना पढता है कि गुरुत्वाकर्षण शक्ति कि खोंज न्यूटन ने की ,ये हमारे लिए शर्म की बात है.

भास्कराचार्य सिद्धान्त की बात कहते हैं कि वस्तुओं की शक्ति बड़ी विचित्र है।

मरुच्लो भूरचला स्वभावतो यतो
विचित्रावतवस्तु शक्त्य:।।
– सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय – भुवनकोश
आगे कहते हैं-

आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं
गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या।
आकृष्यते तत्पततीव भाति
समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे।।
– सिद्धांतशिरोमणि गोलाध्याय – भुवनकोश

अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे? अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियाँ संतुलन बनाए रखती हैं।

ऐसे ही अगर यह कहा जाय की विज्ञान के सारे आधारभूत अविष्कार भारत भूमि पर हमारे विशेषज्ञ ऋषि मुनियों द्वारा हुए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ! सबके प्रमाण उपलब्ध हैं ! आवश्यकता स्वभाषा में विज्ञान की शिक्षा दिए जाने की है !

(मरुच्लो भूरचला स्वभावतो यतो
विचित्रावतवस्तु शक्त्य:।।
सिद्धांत शिरोमणी गोलाध्याय-भुवनकोश (5)
आगे कहते हैं-

आकृष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं
गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या।
आकृष्यते तत्पततीव भाति
समेसमन्तात् क्व पतत्वियंखे।।
सिद्धांत शिरोमणी गोलाध्याय-भुवनकोश- (6))

#कृष्णप्रिया

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