जो जिज्ञासु हैं और जिन में संकल्प की और बड़े पुरुषार्थ की लालसा है उनके लिए कतिपय निवेदन: रामेश्वर मिश्र पंकज

जो जिज्ञासु हैं और जिन में संकल्प की और बड़े पुरुषार्थ की लालसा है उनके लिए कतिपय निवेदन:रामेश्वर मिश्र पंकज
1. पहली बात तो यह है कि राज्य के विषय में ,राज्य के उत्कर्ष के विषय में ,राष्ट्र के विषय में और राष्ट्र के उत्कर्ष के ओविषय में तथा नई संरचनाओं के निर्माण और अभ्युदय के विषय में सोचने वाले संसार में सदा ही थोड़े से लोग होते हैं ।
शेष लोग गतानुगतिक होते हैं ।जो चल रहा है उसी में अर्थ ढूंढ लेते हैं ।
जब अंग्रेज भारत में जमे तो उनके भारत आगमन को ईश्वर की बहुत बड़ी कृपा मानने वाले करोड़ों लोग थे और उनको बाहरी अजनबी आतताई मानने वाले मुट्ठी भर लोग थे ।
धीरे-धीरे धीरे उन्होंने वातावरण बनाया और उन्हें भागने पर विवशकर दिया परंतु उसी बीच ऐसे कमीने लोग भी आए जिन्होंने उनसे सौदेबाजी कर बिचौलिए की तरह सौदेबाजी करते हुए सत्ता स्वयं हड़प ली ।
इन राजनीतिक बारीकियों को जो नहीं समझता वह भविष्य में भी देश के लिए कुछ भी सार्थक नहीं कर पाएगा पहली बात तो यह मन में ठाननी आवश्यक है।

2. राज्य क्या है ?समाज से उसका संबंध क्या है ?अलग-अलग समाजों में राज्य की अलग अलग समय पर परंपराएं क्या रही हैं ?
कम्युनिज्म में राज्य का क्या स्वरूप मान्य है,ईसाइयत या इस्लाममें राज्यका क्यास्वरूप मान्य है,आधुनिक यूरोअमेरिकी सभ्यतामें राज्यका क्यास्वरूपहै, इन तथ्यों को जाने बिना सामान्य राजनीति बड़े आराम से चलती है परंतु किसी समाज के प्रबुद्ध जन इन विषयों को नहीं जानते हो तो वह समाज मरा हुआ माना जाता है ।
ऊपर से जी रहा है ,धीरे-धीरे मर जाएगा ।
दुर्भाग्यवश हिंदू समाज की इस समय यही स्थिति है इसलिए अगर कोई पुरुषार्थी प्रबुद्ध जन हो जो इसे एक चुनौती की तरह लेने को स्वधर्म मानें तो उन्हें इस इन विषयों पर मीमांसा के लिए प्रवृत्त होना चाहिए।

3. ऐसा नहीं है कि कांग्रेस या कम्युनिस्ट पार्टी या समाजवादी आदि किन्ही भी दलों में हिंदुओं में एक भी व्यक्ति ऐसा है जो इन विषयों पर विचार करता हो या जानता हो।
इसका प्रमाण यह है कि यह सभीदल किसी न किसी रूप में सत्ता में है अथवा संसाधन संपन्न है और विगत 70 वर्षों में इनसे जुड़े एक भी बौद्धिक ने राजनीति शास्त्र पर इन विषयों पर एक भी पुस्तक नहीं लिखीहै परंतु तब भी इन लोगों को अपने पापाचरण में कोई समस्या उत्पन्न इसलिए नहीं होती कि उनकी ओर से इस्लाम अथवा ईसाइयत अथवा आधुनिक यूरो अमेरिकी सभ्यता अथवा कम्युनिस्ट प्रबुद्ध जनों ने विश्व में पहले से इन विषयों पर बहुत विस्तार से पिछले 100 वर्षों में लिख रखा है तो इन्हें सीधे-सीधे उनकी नकल करनी है या उनके बताए मार्ग पर चलना है और इस अर्थ में बौद्धिक रूप से ये उनकेदास हैं यद्यपि राजनीतिक रूप से यह पूर्ण स्वतंत्र और मनमानी कर रहे हैं और इनकी गाड़ी चलने में कहीं कोई रुकावट नहीं ।
हिंदुत्व की बात करने वाले लोग इस दृष्टि से बहुत पिछड़े हैं क्योंकि विगत 100 वर्षों में इन विषयों में विद्या केंद्रों के विनाश के कारण जो अंग्रेजों ने नियोजित रूप से किया था उस विनाश के कारण भाव से तो ये हिंदुत्वनिष्ठ सुनिश्चित रूपसे हैं परन्तु विद्याकेस्तरपर वे इस्लाम,ईसाइयत,कम्युनिज्म या आधुनिक यूरोअमेरिकी मान्यता से संचालित ही हैं और इस तरह से वे और उनके बाल बच्चे संसाधन संपन्न होते जा रहे हैं परंतु हिंदू समाज को खोखला करने में ही वे योगदान दे रहे हैं, हिंदू समाज को इन विषयों में प्रबुद्ध बनाने में उनकी कोई भी भूमिका नहीं है।
हिंदुत्व से जुड़ी राजनीति करने वाले लोगों के पास विगत 70 वर्षों में ऐसा एक भी राजनीति शास्त्री विद्वान नहीं पैदा हुआ जिसने इन विषयों पर गहराई से सोच कर कुछ भी लिखा हो।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय में बड़ी सामर्थ्य थी और उन्होंने कतिपय सूत्र दिए परंतु उनको विकसित नहींकियागया। अतः केवल नारेही हैं।व्यवस्थितरूपसे कोई विचार कहीं है नहीँ हिन्दू राजशास्त्रपर आधुनिक स्थितिकेलिए।

4. भारत में राज्य का अभी जो ढांचा है वह ढांचे की दृष्टि से यूरो अमेरिकी आधुनिक लोकतंत्र वाला ढांचा हैं, वैचारिक दृष्टि से वह कम्युनिस्ट ढांचा है जो कि नौकरशाही को भयंकर अधिकार देता है और व्यावहारिक दृष्टि से वह ईसाइयत या इस्लाम या कम्युनिज्म या क्षेत्रीय पहचान या जाति पहचान आदि के नाम अराजकता और कानून के उल्लंघन के लिए उन्मत्त समूहों को संरक्षण दे रहा विचित्र सा ढांचा है ।
इस प्रकार भारतका वर्तमान राज्य ऐसा हो गया है कि स्वयं राज्यकर्ता लोग अराजकता को बढ़ावा देते हैं और कानून को तोड़ने को बढ़ावा देते हैं तथा फिर कानून के नाम पर काफी संसाधन इकट्ठे करते हैं और इस गंभीर स्थिति पर गंभीरता से चिंतन करने वाला एक भी राजनीतिक समूह भारत के विश्वविद्यालयों में या अन्य फाउंडेशन या प्रतिष्ठान या विद्या केंद्र आदि में कहीं भी नहींहै।

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