मेरी कविता “जनसँख्या जिहाद” का एक अंश:ओज कवि जनार्दन पांडेय प्रचंड

मेरी कविता “जनसँख्या जिहाद” का एक अंश:ओज कवि जनार्दन पांडेय प्रचंड

मटके भर भर दूध पिलाओ, सर्प सदा विष दाता है !
गिरगिट पालो राजमहल में, तब भी रंग दिखाता है !! 1

दुष्टों से संयम की आशा, मूरख हैं जो करते हैं !
वो नर अपने ही कर्मों से, भश्मासुर जन मरते हैं !! 2

हलवाई के मिष्ठानों का, श्वान नहीं रखवाला है !
अरे ततैया के छत्ते से, किसने सहद निकाला है !! 3

चौदह सदी पुराना विष जो, मानवता का पातक है !
कई सभ्यता लील चुका जो, आर्य वंश का घातक है !! 4

वह विष जिसके मटके में पय, एक बूंद स्वीकार नहीं !
मलय पवन की पुरवाई जो, करता अंगीकार नहीं !! 5

पांच ग्राम की बात छोड़ दो, सूई भर भूमि न देता है !
खींच रेखिका इक पत्थर की, त्रिण भर ना करवट लेता है !! 6

छके नहीं उस विष को जो भी, विषधर से कटवाता है !
चालीस सभ्यता निगल चुका, अजगर बढ़ता ही जाता है !! 7

बना हुआ है संकट हर पल, जो विश्व शांति पर खतरा है !
नख दन्त गडा कर पंजों से, जिसने बसुधा को जकड़ा है !! 8

जिस विष ने भगवा मिटा दिया, ईरान देश की माटी से !
शिव बुद्ध किये विस्मृत जिसने, अफगान बलूची घाटी से !! 9

खंड खंड कर भरत भूमि के, जो टुकड़े तीन कराता है !
केशर केरल कलकत्ता में, जो अजगर बीन बजाता है !!10

बन गया हलाहल सम घातक, पल पल मानवता डसता है !
अरुणाचल से कर्णाटक तक, हर नगर शिकंजा कसता है !! 11

उस विष के प्रभाव को आहा ! , मिष्ठानों से रोकोगे !
धर्मराज ऐसी बातों से, निज कुल धर्म डुबो दोगे !! 12

हे धर्मराज यदि शकुनी से, फिरसे द्यूत रचाओगे !
राज बन्धु तनया भार्या, निज सर्वस्व लुटाओगे !! 13

जिस महानाश से धरती को , केशव भी ना सके बचा !
उसे टालना चाह रहे तुम, अहा ! छद्म इक द्यूत रचा !! 14

रण निश्चित है लड़ना होगा, केशव भाग्य विधाता है !
पाप जलेगा महासमर में, सत्य जगत का त्राता है !! 15

रण निश्चित है अविनाशी है, तुम जब तक सत्य नकारोगे !
हे धर्मराज अनजाने में, लाखों अभिमन्यू मारोगो !! 16
– Janardan Pandey Prachand ( ओज कवि जनार्दन पांडेय प्रचंड 9611082698 )
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