संसार का सर्वाधिक संगठित समाज है हिन्दू -रामेश्वर मिश्र पंकज

संसार का सर्वाधिक संगठित समाज है हिन्दू
—————————————————–
हिंदू समाज विश्व का सबसे संगठित समाज है जबकि तरह-तरह के संगठन भारत वर्ष में ऐसे उत्पन्न हो गए हैं जो हिंदू समाज की मुख्य समस्या इसका संगठित न होना बताते हैं और इस को संगठित करने के लिए कार्यरत हैं .
इन संगठनों के इस विचार के पीछे स्वयं हिंदू समाज के विषय में उनका अज्ञान तो है ही ,विश्व के विषय में भी गहरा अज्ञान है ..यह पता नहीं चलता कि संसार के किस समाज से तुलना करके वह हिंदू समाज को असंगठित बताते हैं.

विश्व के जितने भी समाज हैं उन से तुलना करके देखिए तो इस समय ईसाइयत और इस्लाम सबसे बड़े होने का दावा करते हैं जबकि ईसाईयत के संगठन का यह हाल है कि उसमें 50 से अधिक महत्वपूर्ण पंथ एक दूसरे के खून के प्यासे रहे हैं और उनके झगड़ों से समाज को बचाने के लिए ही सेकुलर स्टेट की धारणा से यूरोप का प्रत्येक नेशन स्टेट संगठित हुआ.
तब भी यूरोप का प्रत्येक नेशन स्टेट ईसाईयत के किसी न किसी पंथ को अपना राजधर्म घोषित करता है, उसे विशेष राजकीय संरक्षण देता है और वहां की शिक्षा तथा न्याय व्यवस्था उसी पंथ के अनुशासन में चलती है .उदाहरण के लिए इंग्लैंड में प्रोटेस्टेंट ईसाई धर्म है, स्पेन और इटली में कैथोलिक ईसाई धर्म है ,अन्य अनेक देशों में लूथेरियन ईसाइयत राजधर्म है और कई में orthodox ईसाइयत राजधर्म है .प्रत्येक देश की न्याय व्यवस्था और शिक्षा में संबंधित इसाई पंथ का ही आधिपत्य है. यही कारण है कि 50 से अधिक नेशन स्टेट में ईसाइयत बंटी हुई है और उनकी परस्पर भिन्न भिन्न मान्यताएं हैं .

इसी प्रकार मुस्लिम समाज में भयंकर विषमता है और इस्लाम का इतिहास ही अलग अलग कबीलों के खूनी झगड़े का इतिहास है जिसमें एक कबीला दूसरे कबीले को पूरी तरह सफाया कर डालने के लिए तत्पर रहा है .केवल लूट के माल में यानी माल ए गनीमा में और अन्य समाजों के प्रति क्रूरता और कठोरता के उन्माद के विषय में विभिन्न मुस्लिम पंथों में आम सहमति है परंतु आपसी व्यवहार में वहां भयंकर विषमता है और ऊंच नीच है .यह बात भारत के शिक्षित समाज को या तो पता नहीं है ,या हमारे नेता और संचार माध्यम जानबूझकर इसे छुपाते हैं.
जहां तक हिंदू समाज की बात है, इसकी एकता के विस्तार पर बात करने से पहले वर्तमान स्थिति पर एक नजर डाल लेना उचित होगा .1947 ईस्वी के बाद भारत की हर पार्टी ने अंग्रेजों के बनाए कानून को ही भारत में लागू करने को अपना कर्तव्य घोषित कर रखा है जबकि संसार के प्रत्येक समाज में और संपूर्ण विश्व में यह सर्वानुमति है कि कानून का आधार प्रत्येक समाज में उस समाज की मान्यताएं और प्रथाएं होती हैं परंतु हमारी पार्टियां हिंदू समाज की प्रथाओं और मान्यताओं को भारत के कानून का कोई आधार नहीं मानती.
यही नहीं संसार में सर्वत्र यह माना जाता है कि बहुसंख्यकों को समाप्त कर उन पर अपना मजहब थोपना एक दंडात्मक और दंडनीय अपराध है जिसको कठोरता से दमित करने की आवश्यकता है परंतु भारत के शासक इसे एक पुण्य कर्म मानते हैं कि यहां इस्लाम और ईसाइयत के लोग बहुसंख्यकों के धर्म अर्थात हिंदू धर्म को समाप्त करने की खुली घोषणा करें और भारत में इसे एक पुण्य कर्म माना जाता है कि इस्लाम और ईसाइयत हिंदू धर्म को खत्म करने के लिए कार्य करें ,बस एक शर्त लगी है कि वह इसके लिए भय और प्रलोभन का प्रयास न करें .
इस प्रकार वर्तमान कानून के रहते भारत की किसी पार्टी का स्वयं को हिंदू प्रचारित करना वोट जुगाड़ने के लिए किया जा रहा प्रचार मात्र है क्योंकि इस्लाम और ईसाइयत को भारत में विशेष संरक्षण प्राप्त है और हिंदू धर्म को कोई संरक्षण अधिकृत तौर पर प्राप्त नहीं है . अतः जब तक कोई पार्टी हिंदू धर्म को संरक्षण देना अपना लक्ष्य घोषित नहीं करती ,तब तक उसका हिंदू धर्म के प्रति किसी भी तरह का प्रेम का भाव प्रचारित करना केवल वोट जुगाड़ने का एक छल मात्र है .
भारत में अभी जो व्यवस्था लागू है उसमें मान लिया गया है कि सामान्य नागरिक स्वभाव से विकृत होता है और उसका सत्य से कोई संबंध नहीं होता इसलिए उस पर नियंत्रण करने का जिम्मा शासन का है .
इसके साथ ही इसमें यह मान्यता निहित है कि नागरिकों को सदाचार सिखाना राज्य का कर्तव्य है और इसीलिए वह नागरिकों को मौलिक अधिकार और मौलिक कर्तव्य सिखाता है .साथ ही यह माना जाता है कि केवल शासकीय अधिकारी ही सच बोलते हैं और केवल वही न्याय करते हैं इसीलिए यहां प्रशासक और विभागों के प्रमुख के रूप में मंत्री ,राज्य के प्रमुख के रूप में मुख्यमंत्री और देश के प्रमुख के रूप में प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति को कानूनन ऐसे अधिकार प्राप्त है कि वह न्याय के विषय में निर्णय ले सकते हैं न्यायपालिका के अधिकारी भी शासकीय अधिकारी हैं अतः उन्हें न्याय करने की सामर्थ्य प्राप्त है ,ऐसा माना जाता है .जबकि साधारण नागरिक स्वभाव से झूठ ही बोलेगा या गलत ही करेगा और उस को नियंत्रण में रखना आवश्यक है, ऐसी मान्यता है .
इसके साथ एक नया प्रचार यह हुआ है भारत में कि मानो हर पुरुष स्त्री के प्रति खराब दृष्टि ही रखेगा और इसलिए स्त्रियों को उससे विशेष संरक्षण की आवश्यकता है और स्त्रियां अपनी रक्षा स्वयं कदापि नहीं कर सकती इसलिए उनके विषय में ऐसे कानून बनाना आवश्यक है कि अगर वह किसी के विषय में कोई ऐसा वक्तव्य दे दें जिससे लगे कि उस व्यक्ति ने उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया है तो उसे सेक्स के विषय में, सेक्स संबंधी व्यवहार के विषय में प्रमाण माना जाए और उस पुरुष के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही शुरु कर दी जाए परंतु वही स्त्री जब अन्य विषयों में कोई बयान देती है तो उसको कोई प्रमाण नहीं माना जाता.
इस तरह केवल सेक्स संबंधी व्यवहार को असाधारण महत्व देना और शेष व्यवहार में सामान्य स्त्री और सामान्य पुरुष की कोई भी हैसियत न मानना तथा उसकी नीति और नीयत के बारे में शंका करना वर्तमान राजकीय व्यवस्था के मूल में है .स्पष्ट है कि इसका न तो इस्लाम से कोई संबंध है और ना ही हिंदू धर्म से.ईसियत का अवश्य इससे कुछ सम्बन्ध हैं परंतु प्रबुद्ध यूरोप के किसी भी नेशन स्टेट में ऐसा कोई कानून संभव नहीं है.
शिक्षा और धर्म के विषय में हिंदू समाज को कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं है और भारत का वर्तमान शासन हिंदुओं की किसी ज्ञान परंपरा और विद्या परंपरा के अस्तित्व को नहीं मानता .वह केवल यूरोपीय ज्ञान परंपरा को ही प्रमाण मानता है तथा उसे भारत में फैलाने के लिए संकल्पित है और यूरोपीय विद्या परंपरा को फैलाने वाले को ही विशेष ज्ञानी मानता है तथा सभी राजकीय अधिकारी इस विद्या परंपरा के ही प्रति आस्थावान हैं.
इस विशेष स्थिति के समक्ष भारत की परंपरागत विद्या परंपरा और समाज व्यवस्था को देखना होगा. भारत की परंपरागत समाज व्यवस्था में यह मान्य रहा है कि सार्वभौम नियमों के अंतर्गत प्रत्येक समूह की व्यवहार संबंधी कुछ अपनी मान्यताएं और परंपराएं होती हैं और उस समूह में उनका ही पालन उचित है परंतु इन सभी मान्यताओं और परंपराओं का सार्वभौम नियमों अर्थात धर्म से अनुशासित होना आवश्यक है .
न्याय की व्यवस्था के लिए जाति पंचायत और खाप पंचायतें तथा ग्राम पंचायतें अनादिकाल से कार्यरत हैं तथा अपने समाज के आचरण के विषय में नियम बनाने का अधिकार इन पंचायतों को ही प्राप्त है . उन मर्यादाओं का अतिक्रमण न हो ,केवल यह देखना राज्य का कर्तव्य माना जाता था.
जातियों और संप्रदायों में सुविभाक्त हिंदू समाज संसार का सबसे संगठित और व्यवस्थित समाज है .इसकी स्वाभाविक इकाइयों को मान्यता न देकर उनको कोई विकार अथवा विकृति प्रचारित कर फिर नए रूपों में इसे संगठित करने का प्रयास के केवल विफलता और बिखराव को जन्म देता है और जन्म देगा. इस सामान्य से तथ्य को वर्तमान संगठन नहीं समझते .

जातियां कुलों का यानी परिवारों का समूह हैं और जाति व्यवस्था में एकमात्र विकृति उंच नीच की आई जिसे समाज ने सहज दूर कर दिया है . इसके बाद जाति नैसर्गिक ईकाई है और अपनी पहचान का आधार है , यूरोप में भी जन्म तथा हैसियत के आधार पर अनेक वर्ग बने हैं और भारी विषमतायें हैं .नागरिकों के जो नए संगठन बनते हैं उनमे भी बड़े छोटे के अनेक स्तर मान्य होते हैं और वे संगठन ही हैं . तब जाति नमक स्वाभाविक संगठन में क्या दोष है , यह बताने में लोग असमर्थ हैं .
अगर जाति की भावना प्रतिस्पर्धा देगी तो फिर विविध सगठनों में भी घोर प्रतिस्पर्धा संभव है . पार्टियों की गलाकाट प्रतिस्पर्धा सर्व विदित है , स्पष्ट नहीं है कि आपत्ति अनुचित व्यवहार से है या किसी संगठन के अस्तित्व से .अनुचित व्यवहार पर अंकुश के लिए स्वयम संगठन का अस्तित्व नहीं नकारा जा सकता इसीलिए जाति केनाम पर अनुचित भेद व्यव्हार की आशंका से जाति का निषेध अनुचित है .वह एक ट्राइड एंड ट्रस्टड संगठन है .हमने इतनी सरलता से उंच नीच की भावना को दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया ,इस से प्रमाण है कि यह भावना गहरी नहीं है .
शेष विषमतायें तो स्वयम राज्य कर्ता वर्ग में हैं और भीषण हैं . प्रथम से चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का भेद भयंकर है . प्रथम में भी दर्जनों स्तर हैं .
इनके निरंतर समाधान करते रहना पड़ता है .

Leave a Reply