गृहस्थों के ऐश्वर्य में वृद्धि करती है गाय: मुक्तिनारायन पांडेय

गृहस्थों के ऐश्वर्य में वृद्धि करती है गाय
भारतीय संस्कृति और चिंतन परम्परा में गौ को अत्यधिक पूजनीय माना गया है। जो गौओं को पालते हैं, उनकी रक्षा करते हैं गौधन उन गृहस्थों के ऐश्वर्यों की वृद्धि करता है। इसलिए वेद में स्पष्ट उद्घोषणा की गई है कि गौ माता, पुत्री और बहन के समान अघ्न्या है। ऋग्वेद का मंत्र है-
माता रूद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाम् तस्यनाभि:। प्र नु वाचं चिकितुषे जनायमागामानागामदिति वधिष्ट।।
गौ राष्ट्र के रूद्र, वसु और आदित्य ब्रह्मचारियों की माता, पुत्री और बहन है। ये अमृत हैं। ऐसी निष्पाप गौ को कभी मत मार। इसलिए गौ को वेद में रक्षा करने योग्य बतलाया है।
इमं साहस्रं शतधारमुत्संव्यच्यमानं शरीरस्य मध्ये। घृतं दुहानामदितिं जनायाप्रे मा हिंसी: परमे व्योमन्।। यजु.
अर्थात सैंकड़ों तथा हजारों का धारण और पोषण करने वाली दूध का कुआं, मनुष्यों के लिए घृत देने वाली और जो न काटने योग्य गौ है उसकी हिंसा मत कर।
महर्षि दयानंद जी इसी मंत्र पर भावार्थ में लिखते हैं, ‘‘जिस गाय से दूध, घी आदि पदार्थ उत्पन्न होते हैं, जिनके द्वारा सभी का रक्षण होता है, ऐसी गौ कभी भी मारने योग्य नहीं है। जो गाय की हिंसा करे उसे राजा दंड दे।’’
वेद में सभी पशुओं की रक्षा के लिए कहा गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि क्षत्रिय ब्राह्मण की गौ की रक्षा करें, उसकी हिंसा कभी न करें। गौ अघ्न्या है। अत: गौ को कभी नहीं मारना चाहिए। निरुक्त में भी गौ के जो नाम दिए हैं वे हैं- अघ्न्या, उस्रा, उस्रिया, अही, मही, अदिति, जगती और शक्वरी। इन शब्दों में ‘अघ्न्या’ और ‘अदिति’ शब्द गौ के अवध्य होने की तथा ‘अही’ और ‘मही’ शब्द उसके पूज्य होने की सूचना देते हैं।
इसी प्रकार वेद में अनेक स्थलों पर गौ को ‘अघ्न्या’ कहा है और जो उसकी रक्षा करता है उसकी प्रशंसा वेद द्वारा की गई है। मारूतं गोषु अघ्न्यं शर्ध: प्रशंस: अर्थात जो मारूत गौ की रक्षा करते हैं उनके बल की रक्षा करो। इयं अघन्या अश्विभ्यां पय: दुहाम् अर्थात यह अवध्य गौ अश्वि देवों के लिए दूध दे। अघ्न्ये विश्वदानीं तृणं अद्धि अर्थात हे अवध्य गौ तू सदा घास खा।
इसके अलावा और भी शास्त्रों के प्रमाण हैं जहां पर गाय को पूजा के योग्य बताया है।
गावो विश्वस्य मातर: अर्थात गाय सारे संसार की माता है।
वेद से अलग भारतीय साहित्य में भी गौ का महत्व बहुत दर्शाया गया है। जैसा कि महाभारत में- यज्ञांगं कथिता गवो यज्ञ एव च वासव:। एतामिश्च विना यज्ञो न वर्तेत कथंचन।।
भीष्म जी कहते हैं कि गौओं को यज्ञ का अंग तथा साक्षात् यज्ञस्वरूप कहा गया है क्योंकि इनके दुग्ध, दधि और घृत के बिना यज्ञ संपन्न नहीं होता। महाभारत में भी गौओं को अमृत की खान कहा है। वास्तव में गौ सर्वश्रेष्ठ पशु है, फिर भी मनुष्य पता नहीं उसकी हिंसा क्यों करता है। ये गौवें विकार रहित अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत रूपी दूध हमें प्रदान करती हैं। सारा संसार उनके सामने नतमस्तक होता है।
‘गोकरूणानिधि’ नामक ग्रंथ में गाय के आर्थिक दृष्टि से लाभ गिनाते हुए लिखा हैं, ‘‘इस गाय की पीढ़ी में छ: बछिया और सात बछड़े हुए इनमें से एक की रोग आदि से मृत्यु संभव है तो भी बारह शेष रह जाते हैं। उन बछियों के दूध मात्र से 154440 व्यक्तियों का पालन हो सकता है। अब रहे छ: बैल उनमें एक जोड़ी से 200 मन अन्न उत्पन्न हो सकता है। इस प्रकार तीन जोड़ी 600 मन अन्न उत्पन्न कर सकती है। प्रत्येक मनुष्य का तीन पाव भोजन गिने तो 256000 मनुष्यों को एक बार भोजन होता है। इन गायों को परपीढिय़ों का हिसाब लगाकर देखा जाए तो असंख्य मनुष्यों का पालन हो सकता है।
भारतीय इतिहास में आर्य राजाओं के यहां तो गौ रक्षा होती ही थी। इतिहास प्रसिद्ध रघुवंशी महाराजा दिलीप ने शेर के सामने गौ की रक्षा के लिए अपने आपको प्रस्तुत किया। तभी तो उस समय का भारत समस्त संसार का गुरु कहलाता था। मनु महाराज की यह घोषणा कि पृथ्वी के सभी मानव भारत में शिक्षा लेने आते थे। वह युग कितना सुंदर रहा होगा, इसका कारण गौ का सात्विक दूध और गौ रक्षा का ही फल था।

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