सनातन विज्ञानम विजयते/सनातन धर्म के घोषित अघोषित शत्रु :२ -रामेश्वर मिश्र पंकज

सनातन धर्म के घोषित अघोषित शत्रु :२
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एक प्रख्यात जर्मन लेखिका मारिया वर्थ ने अपने संस्मरणों के आधार पर बताया है कि किस प्रकार जो वैज्ञानिक सीधे भारत से प्रभावित होते रहे हैं और जिन्होंने अपने वैज्ञानिक शोध के लिए आवश्यक सैद्धांतिक परिकल्पना की प्रेरणा ही भारतीय दर्शन के अध्ययन से प्राप्त की तथा इस बात को कहा भी ,उन वैज्ञानिकों के नाम और विवरण से भारत से प्रेरित होने वाली बात मिटा दी जाती है .इनसाइक्लोपीडिया से और Wikipedia से भी यह तथ्य गायब कर दिए जाते हैं .

उक्त जर्मन लेखिका ने बताया है कि किस प्रकार ईसाई और मुसलमान दोनों के ही मुख्य लोग भारत के विषय में जानकारी दबाने के लिए एकजुट है और वह इन सब बातों का श्रेय परस्पर बांट लेना चाहते हैं. उन्होंने ही बताया है कि भारत के ज्ञान से प्रेरित होकर ही अनेक बड़े वैज्ञानिकों ने आधुनिक काल में महत्वपूर्ण खोजें की है परंतु इस तथ्य को भी अधिकृत अभिलेखों से छिपाया जाता है .
उदाहरण के लिए यह बात छुपाई जाती है कि ऋग्वेद में लिखा है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है .
उसके स्थान पर कोपरनिकस को इसका श्रेय दिया जाता है.
इसी तरह यह तथ्य छुपाया जाता है कि ब्रह्मांड की आयु का सही-सही निर्धारण वेदों में है जो कि आधुनिक विज्ञान के द्वारा पुष्ट होता है और जिसके कारण बाइबिल में वर्णित ब्रह्मांड की आयु हास्यास्पद हो जाती है .ब्रह्मांड की आयु के विषय में आधार भूत जानकारी वैज्ञानिकों को अपने भारतीय ज्ञान से ही मिली है .सभी जानते हैं कि यूरोप और अमेरिका के प्रमुख वैज्ञानिक भारतीय दर्शन से प्रेरित रहे हैं .
हाइजेनबर्ग, श्रोडिंगर, पावली ,आइंस्टाइन .ओपन हायमर आदि वैज्ञानिक पूरी तरह भारतीय दर्शन से प्रेरित रहे हैं .
प्रथम परमाणु विस्फोट के समय ओपन हाईमर ने प्रकाश देखते ही गीता के श्लोक का स्मरण किया था जिसमें कहा गया है कि यदि हजारों सूर्य एक साथ उदित हो तो जैसा प्रकाश होगा. वैसा प्रकाश परमाणु विस्फोट से चारों ओर फैल रहा है .
आइंस्टाइनको भारतीय दर्शन से ही प्रेरणा प्राप्त हुयी .हमारे दर्शन से अत्यधिक प्रभावित वर्तमान काल में अनेक वैज्ञानिक भारतीय वेदांत दर्शन से प्रभावित रहे हैं. नटराज की मूर्ति के वास्तविक स्वरुप में सतत गतिमय नर्तनशील चेतन ऊर्जा है, यह फ्रित्ज़फ़ काप्रा. ने कहा . यही कारण है कि आधुनिक प्रयोगशालाओं में नवीनतम खोजों के समय नटराज शिव की विशाल मूर्ति रखी जाती है .
परंतु अपने अधिकृत अभिलेखों में इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका और Wikipedia भी यह छिपा जाते हैं ‘

मारिया बताती हैं कि 1982 में मुंबई में एक महत्वपूर्ण सम्मेलन हुआ था जिसमें भारतीय बुद्धि परंपरा और ज्ञान परंपरा का आधुनिक विज्ञान से संबंध — इस विषय पर एक महत्वपूर्ण गोष्ठी हुई थी और जिसमें स्वामी मुक्तानंद जी के व्याख्यान के आधार पर ही वैज्ञानिकों ने चिंतन किया था उसमें से अनेक महत्वपूर्ण धारणाएं निकली जिन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है ट्रांसपर्सनल साइकोलॉजी परंतु Wikipedia इसके बारे में यह बताता है कि ट्रांसपर्सनल साइकोलॉजी का विकास विलियम जेम्स, अब्राहम मास्लो जैसे यूरोपीय मनोवैज्ञानिकों ने किया था और स्वामी मुक्तानंद जो इसके मूल प्रेरकथे यह छिपा जाता है .
संपूर्ण ब्रह्मांड में एक ही दिव्य सत्ता है ,यह वेदांत दर्शन है .इसको यूरोप और अमेरिका के वैज्ञानिक तो मानते हैं परंतु अपने अभिलेखों में, शब्दकोश और ज्ञानकोश में यूरोप और अमेरिका के लोग यह तथ्य गायब कर देते हैं .
इस प्रकार सनातन धर्म के विरुद्ध ,सनातन धर्म की ज्ञान परंपरा और आधारभूत स्थापनाओं के विरुद्ध एक गहरा विद्वेष ईसाई पादरियों और इसाई विद्वानों तथा मुस्लिम लोगों को है इसीलिए वे प्रयास करते हैं कि हिंदू धर्म को संसार की सर्वाधिक बुराइयों का खजाना बताया जाए और इसके लिए जाति प्रथा की बहुत ही विकृत तथा तोड़कर व्याख्या करते हैं और ऐसे दर्शाते हैं कि मानो भारत में untouchables की विशाल संख्या है जिनसे अनुचित व्यवहार आज भी हो रहा है.
जिन्हें वे लोग ऐसी पराधीन दशा में रह रहे समूह बताते हैं ,वह सब लोग भारत में उच्चतम पदों पर पहुंच रहे हैं ,भारत के राष्ट्रपति ,उपराष्ट्रपति ,मुख्यमंत्री ,केंद्रीय मंत्री ,अनेक मंत्री ,अनेक राजपत्रित अधिकारी, अनेक आईएएस-आईपीएस और पीसीएस अधिकारी —यह सब अनुसूचित जाति के हैं और अपना अपना काम अच्छे से कर रहे हैं .
फिर भी ऐसे बताया जाता है मानो कि अनुसूचित जाति के लोगों के साथ सनातन धर्म के अनुयाई आज भी गहरा भेदभाव करते हैं ,ऐसा विकराल झूठ चारो तरफ फैला रखा है दुष्टों ने
मारिया वर्थ बताती हैं कि किस प्रकार नेशनल ज्योग्राफिक से अपनी एक भेंट में नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिक वैज्ञानिक स्टीवन विएनवर्ग ने विश्व के महान वैज्ञानिकों की बात की जिनमें उसने एरिस्टोटल,टोलेमी आदि की भी बात की गैलेलियो न्यूटन के साथ .लिब्नित्ज़ जैसे दार्शनिक की बात की परंतु भारत के विषय में एक शब्द नहीं बोले जबकि सत्य है कि यूरोप के कोई भी महान वैज्ञानिक आधुनिक काल में मूलतः भारतीय दर्शन की प्रेरणा से ही यहां तक पहुंचे हैं .आर्यभट और बोधायन जैसे भारत के महान वैज्ञानिकों तक को अधिकृत रूप से यूरोपीय अभिलेखों में शामिल नहीं किया जाता .जबकि वहां के प्रबुद्ध लोग अब इनके विषय में जान चुके हैं
भारत की महानता से घबराकर आजकल भारत के विषय में लिखी जा रही सभी किताबों में भारत को भारत या इंडिया नहीं कहकर साउथ एशिया कहा जा रहा है और हिंदू धर्म को भयंकर विश्वासों का गढ़ बताया जा रहा है .

उनके द्वारा पोषित अथवा उनके द्वारा खरीदे गए जो एजेंट भारत में सक्रिय हैं वह भी उनकी ही भाषा बोलते हैं और ब्रिटिश काल में जिस मानसिकता से भारत के कतिपय ऊंची जाति के अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग हो गए थे आज भी उस वर्ग की वही मानसिकता है .
वे प्रायः यूरोप के लोगों के द्वारा किए जानेवाले झूठे आक्रमणों के बचाव में आ जाते है जिस प्रकार महान विद्वान और तपस्वी सन्यासी स्वामी दयानंद तक जो कभी यूरोप नहीं गए और यूरोपियों को कभी ज्ञान में आगे नहीं माना ,वह भी मूर्ति पूजा के विरुद्ध प्रचार से दबाव में आ गए और उस पर प्रचंड आक्रमण किया ,उसी प्रकार भारत के अनेक सदाशयी नेता भी यूरोपीय प्रचार से दबकर भारत के दोषों को गिनाने लगते हैं जबकि ईसाईयत और इस्लाम के भयंकर पापों पर पर्दा डाल दिया जाता है और उनकी बात तक नहीं की जाती .
दूसरी और जाति प्रथा जो भारत की सर्वाधिक गतिशील समाज व्यवस्था है और जिसमें एक मात्र बुराई ऊंच-नीच की भावना के रूप में आई थी उसको सहज ही भारतीयों ने हटा दिया है उसके बाद जो एक अत्यंत समाज की आधारशिला है उसके विरुद्ध निरंतर आक्रमण किया जाता रहता है और इस बात को छुपाया जाता है कि ईसाइयत और इस्लाम दोनों ही कबीलाई टकराव और पंथों की कठोरता से आगे बढ़े हैं .
इस्लाम के सारे ही युद्ध मूलतः कबीला यानी जाति पर आधारित युद्ध रहे हैं और यूरोप में आज भी अलग-अलग जातियों यानी कबीलों का भयंकर टकराव जारी है यूरोप और विश्व के विषय में भारत के लोग कुछ ना जाने और केवल अपने किसी महान भविष्य की कल्पना में वर्तमान की किसी काल्पनिक बुराई को बाधक मानकर उसी पर सर धुनते रहें, यह योजना है और इस योजना के प्रचारक भारत में काफी शक्तिशाली हो गए हैं .इसलिए सनातन धर्म के लोगों को अपने ज्ञान की साधना पुनः करनी होगी और सच का प्रचार प्रसार करना होगा ,दूसरों को गालियां देने से काम नहीं चलेगा. अपनी बात तो स्वयं ही करनी पड़ती है

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