धर्मनिरपेक्ष_या_धर्मसापेक्ष: हरिश्चंद्र से लोगों ने पुछाष

*धर्मनिरपेक्ष_या_धर्मसापेक्ष*
*हरिश्चंद्र से लोगों ने पुछा -*

” कहिये महाराज !
आप धर्म-सापेक्ष होंगे कि धर्म-निरपेक्ष ?
यदि आप धर्म-सापेक्ष होते हैं तो आपके स्त्री बिक जायगी, आपका राजकुमार बिक जायगा, आपका राज्य चला जायगा, आप डोम का गुलाम बन जायोगे ।
यदि आप धर्म-निरपेक्ष होंगे तो आपकी स्त्री बिकने से बच जायगी – बनी रहेगी, राजकुमार बना रहेगा, आपका राज्य बना रहेगा, आप डोम के गुलाम नहीं बनेंगे ।
बोलिए क्या मंज़ूर हैं, धर्म-निरपेक्ष या धर्म-सापेक्ष ? ”

राजा हरिश्चंद्र ने कहा :-
” अरे भाई क्या बोलते हो ?
अरे अन्न बिना कुछ दिन प्राण चल सकता हैं,
हम अन्ननिरपेक्ष हो सकते हैं ।
जल बिना कुछ दिन काम चल सकता हैं, हम जलनिरपेक्ष हो सकते हैं ।
राज्य बिना भी काम चल सकते हैं, हम राज्यनिरपेक्ष भी हो सकते हैं ।
पर धर्म बिना हम एक दिन भी नहीं जी सकते, धर्मनिरपेक्ष हम कैसे रह सकते हैं ?
इसलिए धर्म-निरपेक्ष नहीं होंगे ।
राज्य जाय तो जाय, रानी बिके, राजकुमार भी बिके तो बिके, मुझे भी डोम का गुलाम बनना पड़े तो पड़े ; पर हम धर्मनिरपेक्ष नहीं, धर्मसापेक्ष रहेंगे । ”

आजकल ‘ सापेक्ष ‘ शब्द का अर्थ किया जाता हैं पक्षपात ।
कौन से कोश में, कौन सी डिक्सनरी में ऐसा अर्थ हैं ?
कोई बतलाने का कष्ट नहीं करते कि किस डिक्सनरी में ‘ अपेक्षा ‘ शब्द का अर्थ लिखा हैं पक्षपात !
कोई बाबाजी अन्न नहीं खाते तो आप कह सकते हैं बाबाजी अन्न-निरपेक्ष हैं ।
कोई नंगे रहते हैं तो कह सकते हैं बाबाजी वस्त्र-निरपेक्ष हैं ।
इस तरह प्रयोजन का नाम हैं अपेक्षा । जिसको जिस चीज़ की प्रयोजन नहीं, वह उससे निरपेक्ष हैं ।
तुमको धर्म की प्रयोजन नहीं तो तुम धर्म-निरपेक्ष हो ।
इसका मतलब वे-दीन, वे-ईमान, वे-धर्म होना पसन्द हैं ।
यदि हम वे-दीन, वे-ईमान, वे-धर्म होते हैं तो हमारे मत में गाली हैं ।
किसी को वे-दीन, वे-ईमान, वे-धर्म कहना गाली देना हैं ।
इस दृष्टि से भाई, धर्म-निरपेक्ष बने या धर्म-सापेक्ष ?
धर्म-सापेक्ष बनना ही उपयुक्त हैं ।

*~अभिनव शंकर यतिचक्र चूड़ामणि परमपूज्य ब्रह्मलीन धर्मसम्राट स्वामी श्री करपात्री जी महाराज के ‘ भागवत सुधा ‘ ग्रन्थ से संकलित*
सनातन धर्म की जय हो ।

*प्रस्तुति- आचार्य विजय शंकर मिश्र*

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