ब्राह्मणों के जाति संहार की राजनीति: रामेश्वर मिश्र पंकज

ब्राह्मणों के जाति संहार की राजनीति
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एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई है ,
हम सभी जानते हैं कि ऋषियों और ब्राह्मणों के कुल में ही राक्षस भी हुए हैं परंतु आधुनिक शिक्षा के असर से इस जानने को वर्तमान से जोड़ना पूरी तरह भूल गया है जबकि यह सनातन सत्य है और निरंतर ऐसी प्रक्रिया चलती रहती हैं, ऐसी चीजें घटित होती रहती है.
15 अगस्त 1947 को यही हुआ .ब्राम्हण कुल में उत्पन्न श्री जवाहरलाल नेहरू ने बीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक राक्षसी ,क्रूर और पैशाचिक तंत्र सोवियत कम्युनिस्ट तंत्र से सांठगांठ कर बहुत ही चतुराई से अंग्रेजों से नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बदले में सत्ता मांग ली और उनकी अनेक शर्तें मान ली तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस के द्वारा किसी भी समय मार भगाये जाने से भयभीत अंग्रेजों ने मार भगाये जाने की तुलना में स्वयं एक दानदाता बनने की चतुराई दिखाते हुए सत्ता का हस्तांतरण श्री नेहरू की अध्यक्षता वाली कांग्रेस को और श्री नेहरू के प्रधानमंत्रित्व वाले शासन को कर दिया
श्री नेहरु जी ने सोवियत नेताओं की सलाह से जैसा वहां हुआ था , मुख्य समाज को कमजोर कर अपनी पार्टी के एक गिरोह को भयंकर ताकतवर बनाना, उस नीति की नक़ल करना चाहा और यह योजना बनाकर काम शुरू किया कि हिंदू धर्म को धीरे-धीरे समाप्त करना है , हिंदू धर्म की बुद्धि और अध्यात्म को योजना पूर्वक उपहास का पात्र बनाकर क्रमशः कमजोर करते जाना है . इसके लिए उन्होंने इतिहास का अध्ययन किया और मौलाना आज़ाद आदिसे सलाह ली तथा तय किया कि ब्राह्मणों को शक्तिहीन बनाना है
इसमें काल प्रवाह ने उनका साथ दिया और जन्म ब्राह्मण कुल में होने से ब्राह्मणों के उन्मूलन में वे उसी प्रकार सफल हुए , जैसे मक्का में सनातन धर्म के केंद्र काबा के एक पुजारी परिवार का एक बेटा वहां शिव मंदिर को नष्ट करने में सफल हुआ
महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉ राजेन्द्रप्रसाद नेहरु की नीति जान रहे थे इसीलिए समानांतर धारा को मज़बूत करने के लिए .उन्होंने ब्राह्मणों के पाँव राष्ट्रपति भवन में धोये जिसका नेहरु ने प्रचंड विरोध किया परन्तु जाति को
धर्म और सत्य से अधिक महत्त्व देने वाले कतिपय कांग्रेसी ब्राह्मणों ने नेहरु का साथ दिया और डॉ राजेन्द्रप्रसाद का साथ नहीं दिया जिस से वे अकेले पड गए
नेहरु ब्राह्मणों को कमजोर करने , अप्रतिष्ठित करने और वेद शास्त्र आदि को महत्व हीन बनाने तथा शिक्षा को मौलना आज़ाद की सलाह से चलाने के मार्ग पर चलते रहे और साथ ही ब्राह्मणों को जहां संभव हो प्रत्यक्ष आघात से नष्ट करना भी तय किया .
परिणाम यह हुआ कि महात्मा गांधी की रक्षा का दायित्व उन्होंने नहीं निभाया और खुफिया सूचना होने पर भी उनका वध होने दिया तथा इस अवसर का लाभ उठाकर महाराष्ट्र के ब्रह्मणों का दमन और संहार सुनियोजित रूप से शुरू कर दिया .
प्रत्येक गांव से ब्राम्हण भाग भाग कर यहां वहां छिप गए. अधिकांश लोग महाराष्ट्र से बाहर चले गए अथवा किसी अन्य दूर के गांव में छुप गए और बहुत समय तक उन्होंने अपना परंपरागत कार्य छोड़ दिया .कई अन्य व्यवसायों में चले गए और 6 महीने के भीतर कांग्रेस ने महाराष्ट्र में कई हजार ब्राम्हण घायल कर दिया तथा कईयों को विस्थापित होने को विवश कर दिया, कुछ को मार ही डाला परंतु उस समय पंडित मौलिचंद्र शर्मा और पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र जैसे वरिष्ठ कांग्रेसियों के नेतृत्व में योजना पूर्वक इस भयंकर अन्याय को समाप्त करने का प्रयास चला और कोई भी विधिक आधार प्रस्तुत न कर पाने के कारण अंत में कांग्रेस शासन न्यायालय में अपने को विफल प्रमाणित रूप से मान कर बेइज्जती से भयभीत हो कर उस प्रतिबंध आदेश को तथा मारकाट की उस योजना को वापस लेने को विवश हुआ ,.

इसी प्रकार जवाहरलाल नेहरु ने अपने ही कश्मीरी बंधु-बांधवों कश्मीरी पंडितों को क्रमश: कश्मीर से भगाने की पाप पूर्ण योजना से वहां पहले तो शेख अब्दुल्ला को बढ़ाया ,धारा 370 जैसे गलतकाम किये और कश्मीर का प्रश्न संयुक्त राष्ट्र महासभा में जाने दिया .उनका मनोरथ सफल हुआ, साकार हुआ और कुछ वर्षों बाद कश्मीरी पंडित कश्मीर से भगा दिए गए, कहीं जम्मू , कहीं दिल्ली ,कहीं अन्यत्र रहने को विवश हो गए.

सीधे युद्ध से अथवा सैन्य बल से यह पाप संभव नहीं था इसलिए इसमें बहुत सारे छलपूर्ण कौशल का सहारा लिया गया और बात आगे बढ़ने पर यह नीति मुख्य योजनाकारों के भी हाथ से निकल गई.

विदेशी शक्तियां अनेक प्रकार की हैं .बहुत सी शक्तियां भारत की मित्र हैं और बहुत सी शत्रु हैं.
तो भारत की शत्रु शक्तियों ने भारत में ब्राह्मणों पर आघात करने का जो एक पुराना क्रम चल रहा था उसे नया आयाम देने के लिए यहां अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए जिनमें एक आर्य आक्रमण सिद्धांत और दूसरा दलितवाद है .इसमें कुछ लोगों के राजनीतिक स्वार्थ बड़े पैमाने पर जुड़ ग.
ए परिणाम यह हुआ कि दलितवाद के नाम पर एक ऐसी राजनीति शुरु हुई जिसका मूल उद्देश्य मुख्यतः ब्राह्मणों पर और साथ ही अन्य जातियों पर आक्रमण करके तथा दबाव बनाकर उनसे राज्यसत्ता का बड़े से बड़ा हिस्सा अन्याय पूर्वक हड़पना है और यह काम सीधे संभव नहीं था इसलिए इसे एक झूठा नैतिक रुप दिया गया, एक झूठा किस्सा फैलाया गया कि शताब्दियों से कुछ जातियों पर भयंकर अत्याचार हुए .

बिना किसी प्रमाण के इसे मान लिया गया और मुसलमानों ने जिन जातियों पर अत्याचार किया था, उन जातियों पर हुए समस्त अत्याचार की जिम्मेदारी ब्राम्हणों के नेतृत्व में द्विजों द्वारा किए गए अत्याचार के रुप में प्रस्तुत करके उन पर डाल दी गई.
जिन्हें वैश्य जातियां कहते हैं , जिनमें व्यापारी, किसान, गोपालक ,पशुपालक, शिल्पी आदि हैं उनकी बहुत बड़ी संख्या सदा से ही भारत में अपने हुनर में और कलाओं और कौशल में अग्रणी थी और साथ ही उनके अनेक जगह राज्य रहे है.
जब भारतीय राजनीति में छल और छीना झपटी का यह दृश्य उन लोगों ने देखा तो उनमें से कुछ में राजनीतिक लालसाएं जग गई और उन्होंने आदरणीय इंदिरा जी से मिलीभगत कर एक नई योजना बनाई जिसमें एक तथाकथित अन्य पिछड़ी जातियां नामक आयोग बनाया गया .
उस आयोग के द्वारा भारत में अधिकृत रूप से हुई जनगणना का उपयोग नहीं किया गया क्योंकि उस जनगणना में अन्य पिछड़ी जातियां इतनी बड़ी संख्या में प्रस्तुत नहीं हो रही थी इसलिए उन्होंने हर जिले से 2 ऐसे गांव चुने जिसमें उनके एजेंडे में जो जाती हैं जिन्हें पिछड़ा दिखाना था उनकी बहुतायत थी और पहले तो बिहार के हर जिले में और बाद में देश के भी अनेक जिलों में ऐसे गांव चुनकर उनकी जनगणना हुई और फिर उन्हें नमूना सर्वेक्षण कहकर इसे ही भारत की वास्तविक जनगणना में अन्य पिछड़ी जातियों का अनुपात बता दिया गया.
इस पर भी यह समस्त छलपूर्ण आंकड़ा 37% से आगे नहीं बढ़ा तो पहले तो इसमें गणित की चालाकी करके 37 जिसका योग होता था ,उसे 42 कर दिया और फिर कहा गया कि अल्पसंख्यकों का भी पिछड़ा हुआ वर्ग है और इसलिए समस्त अल्पसंख्यकों की जो आबादी है उसका भी 54 % इसमें जोड़ दिया गया . कहा कि कम से कम देश की आबादी के क 12% अल्पसंख्यक पिछड़े हैं (जो अल्पसंख्यकों की कुल आबादी का 54 % हैं )और इस तरह इसका जोड़ बनाया गया और फिर उनके लिए आरक्षण की मांग के गयी .
यह संपूर्ण आंकड़े बाजी चली जो मंडल कमीशन की प्रकाशित रिपोर्ट में साफ देखी जा सकती है और जिस समय इसको लागू करने का आंदोलन चला ,उस समय मैंने दिल्ली में दैनिक हिंदुस्तान ,जनसत्ता और नवभारत टाइम्स में तथ्यों के साथ लेख लिखे थे ,कहीं यह लेख 3 अंकों में छपे , कही २ में और उसी समय मैंने गांधी शांति प्रतिष्ठान , नई दिल्ली में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी की थी जिसमें तत्कालीन बी पी सिंह मंत्रिमंडल के तेरह मंत्री आए थे, देश के प्रतिष्ठित संपादक और विचारक आए थे और जाहिर है कि VP सिंह के मंत्रिमंडल ने तो पूरी तरह आरक्षण का पक्ष लिया लेकिन दिल्ली के सभी प्रबुद्ध नागरिकों ने मंडल की रिपोर्ट को जालसाजी बताया .
ब्राह्मणोंतथा अन्य द्विज युवकों ने आत्मदाह किया. इसके बावजूद क्रूरतापूर्वक VP सिंह के नेतृत्व में मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू की गई और सत्ता में एक बड़ा हिस्सा ले लिया गया .
यही है कि इसे छाती ठोक कर यह कहने की बहादुरी किसी में नहीं है कि हम तो अन्यायपूर्ण सत्ता अंश लेकर रहेंगे और इसे करुणा की तरह या याचना की तरह प्रस्तुत करते हैं कि हमारे साथ बड़ा अन्याय हुआ है इसलिए अब हमें आरक्षण देना चाहिए. ऐसी राजनीति है. उसमें यह स्वाभाविक है .
परंतु इसमें सबसे बड़ी जड़ता द्विजों की और विशेषकर ब्राह्मणों की प्रकट होती है .उन्होंने भी इसे अन्याय किए गए समाज के साथ हो रहे न्याय की तरह ले लिया जो कि झूठ है.
सभी जानते हैं कि जिन्हें अस्पृश्य कहते थे , किसी समय उनके साथ अन्याय हुआ तो सारे ही समाज ने वह अन्याय किया था .भारतवर्ष में हिंदू समाज में प्रथम जनगणना में ही अस्पृश्य २ से ४ प्रतिशत पाए गए थे ..उनके साथ जो अन्याय हुआ , वह सबसे ज्यादा यादव, कुर्मी आदि मझोली जातियों ने ही किया .

इन अनुसूचित जाति के लोगों पर ब्राह्मणों के नेतृत्व में जो अत्याचार हुआ है , वह महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में और तमिलनाडु के कुछ इलाकों में , शेष जगह तो यादवों कुर्मियों आदि ने ही अन्याय किया .अब विदर्भ और तमिलनाडु के जो हिस्से हैं , उन्हें इसे पूरे देश का नमूना बनाना उतना ही गलत है जितना मंडल आयोग के द्वारा २ गांव कीजनगणना को पूरे जिले की जनगणना का आधार बनाना.

अब स्पष्ट रूप में यह सत्ता में अन्याय पूर्ण अंश हडपने का मामला है .इसे किसी भी तरह केवल नौकरी का मामला जो लोग मानते हैं, वे बहुत ही अज्ञान में है ,यह सीधे-सीधे सत्ता में अन्याय पूर्वक अपना बड़ा हिस्सा लेना है .यही काम मुसलमानों ने किया और नेहरू के नेतृत्व में उनको वह अन्याय पूर्ण हिस्सा दिया गया और शेष बचे अंश में भी हिंदुओं का पूर्ण अधिकार नहीं माना गया अपितु जिन्होंने अपना एक बड़ा हिस्सा मांग लिया था ,उन मुसलमानों का ही बराबर का हिस्सा यहां भीदे दिया गया और इसका विरोध करने की संभावना ब्राह्मणों में थी तो उन ब्राह्मणों का कत्लेआम किया गया अथवा उन्हें मारा-पीटा प्रताड़ित किया गया .

इस प्रकार कांग्रेस के नेतृत्व में और धीरे-धीरे तथाकथित अन्य पिछड़ी जातियों में और संपत्ति से सम्पन्न समूहों में ब्राह्मणों पर अत्याचार करते हुए अपनी मनमानी करने के लिए एक गलत आरक्षण नीति लाकर शासन में अनुचित हिस्सा लेने की इच्छा जाग गई है और कार्य योजना चल रही है जिसका मुख्य लक्ष्य है सत्ता में अन्याय पूर्ण रूप से अपने हिस्से को प्राप्त करना.
इस प्रकार यह सत्ता में अनुचित हिस्सा प्राप्त करने की लड़ाई है और इसीलिए इसमें सच का कोई हिसाब नहीं रखा जाता ,लगातार झूठ बोला जा रहा है और दूसरी ओर ब्राह्मणों से जो समस्या मुसलमानों के एक हिस्से को थी , फिर अंग्रेजों के एक हिस्से को थी .वही इन शासन करने वाले समूहों को हैं और उनका इरादा ब्राह्मणों को पूरी तरह दमित और उत्पीड़ित करके और जहां संभव हो उनका जातीय संहार करके हिंदू समाज की संरचना ही बदल डालने की है .
समाज को बदल डालो ,समाज का रूपांतरण करो आदि नारे इसी उद्देश्य से दिए गए. इसकी संरचना को नष्ट कर दो.

जरूरत इस सत्य को ब्राह्मणों को समझने की है कि आरक्षण कोई नौकरी में स्थान देने का मामला नहीं है . यह कम अंकों वालों को नौकरी देने का मामला नहीं है. यह तो सत्ता में अन्याय पूर्ण हिस्सा हड़पने की रणनीति है जिसके वे हकदार नहीं हैं उस हिस्से को प्राप्त करने की रणनीति है .
हमें मांग करनी चाहिए कि जातिवार जनगणना के आंकड़े प्रकाशित हो और प्रत्येक जाति के पास कितनी संपत्ति है ,कितने पद हैं, इसके तथ्य प्रकाशित हो .इससे पता चल जाएगा कि आज की तिथि में 2018 ईस्वी में मे वस्तुतः कौन सी जातियां भारत वर्ष में पिछडी हुई हैं आर्थिक और सामाजिक रूप से और कौन सी नहीं. .

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